आज की चौपाई

मैं पूछत हों ब्रहमसृष्ट को, दिल की दीजो बताए||टेक||
जो कोई ब्रहम सृष्ट का, सो देखियो दिल विचार|
कहियो तेहेकीक करके, जिनों जो किया करार||१||
किरंतन.. प्र.. १०५


श्री बीतक साहिब क्यूँ और कैसे सुननी चाहिए

हम सभी को बीतक सुनते समझते मंथन करते वक्त बीतक के हरेक लम्हे को आत्मसात करना है । हरेक प्रसंग में हमें डूब जाना है । उसकी एक एक लीला का चितवन करना है । जब उस समय मे हम चले जायेंगे तब असल बीतक समझ आएगी की हमारे धनीजी ने हमारे कारण हमको जगाने के लिए कितने दुख दर्द झेले है । जब हम उसमें डूबेंगे तब हमको असल चितवन का रस मिलेगा । तब परमधाम का चितवन भी होने लगेगा । ये बीतक हमारी अपनी बीतक है । ये कोई कथा नही है । कथा में बोलने व सुनाने वाला अलग सुनने वाला अलग और जिनकी बात सुनाई जाती है वह अलग होता है । जबकि हमारी बीतक में तो हर जगह हम ही हम है । रूह मोमिन सुन्दरसाथ धनी परमधाम हरेक में हमारी मौजूदगी है । इसलिए हमें बीतक सुनते वक्त हमको ही हमारी बाते याद दिलाई जाती है क्योकि भूले भी तो हम ही है तो हम सभी मिलकर बीतक को अब की बार अपनी बीतक के रूप में ग्रहण करे । खुद को ही अपनी बीतक में मेहसूस करे और उन पलों को दिल मे ऐसे भरे की कभी भी इस दिल से वो समय निकल ही न पाए । हमारी अपनी बीतक में हमें खो जाना है । डूब जाना है और उसमें डूबकर इस संसार को तैर जाना है । अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक है । उस अनुभव में डूबना है । अंतर्ध्यान के उस समय मे डूबना है उस वक्त को अभी भी इस समय मे अनुभव करना है । जब से धनी सूरत से निकले कोई भी सुन्दरसाथ अलग नही हुए और आज के दिन तन से अलग होने की बात किसी को भी नही मंजूर थी । क्योकि अब धनी खुद मुलमिलावे की याद में चितवन में हमको ले जाना चाहते है । हमें पल पल उस मे... Read more

परमात्मा एक है

पूर्ण ब्रह्म सच्चिदानन्द तो एक ही हैं, किन्तु लोगों ने अलग-अलग अनेक परमात्मा की कल्पना कर ली है । देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा तो दूर की बात है, आजकल तो पीरों-फकीरों की कब्रों, पेड़, पौधों तथा नदियों के पूजन की परम्परा चल पड़ी है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने ऋषिकेश में तप किया था। शिव जी सदैव ध्यान-समाधि में लीन रहते हैं । महाभारत में योगेश्वर श्री कृष्ण के द्वारा संध्या किये जाने का वर्णन है । भला ये सब किसका ध्यान-वन्दना करते रहे हैं ? वेद का कथन है कि उस अनादि अक्षरातीत परब्रह्म के समान न तो कोर्इ है, न हुआ है, और न कभी होगा। इसलिये उस परब्रह्म के सिवाय अन्य किसी की भी भक्ति नहीं करनी चाहिए। (ऋग्वेद ७/३२/२३) वेद में कहा गया है कि एक ही अद्वितीय ब्रह्म को मेधावीजन इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, गरूत्मान्, दिव्य, यम, मातरिश्वा आदि अनेक नामों से कहते हैं (अथर्ववेद ९/१०/२८) । उस एक सत्यस्वरूप ब्रह्म के विभिन्न गुणों के आधार पर विभिन्न नाम माने गये हैं । वेद में किसी भी देवी-देवता की स्तुति नहीं है । उस ब्रह्म को अखिल ऐश्वर्ययुक्त होने के कारण इन्द्र , सबके लिए प्रीति का प्रात्र होने के कारण मित्र , सबसे श्रेष्ठ होने से वरुण , ज्ञान स्वरूप होने से अग्नि , उत्तम पालन युक्त गुणों से पूर्ण होने से सुपर्ण , महान स्वरूप वाला होने से गरूत्मान् , तथा प्रकाशमय होने से दिव्य कहा जाता है । उस ब्रह्म को ही सबका नियामक होने के कारण यम तथा अनन्त बलयुक्त होने के कारण मातरिश्वा ना... Read more

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