श्री धनीजी के लागूँ पाए,मेरे पिउजी फेरा सुफल हो जाए।
ज्यों पिउ ओलखाए मेरे पिउजी ,सुनियो हो प्यारे मेरी विनती।।
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हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम रसूल साहब ने श्री राजजी से पूछा कि हुकम रुपी वृक्ष के ऊपर मुर्गे श्री श्यामा जी की सूरता ने चोंच में खाक झूठा वजूद क्यों दबा रखी है झूठा तन श्री श्यामा जी ने क्यों धारण किया है तब श्री राजजी ने जवाब दिया कि उम्मत ने ये संसार रुपी झूठा खेल देखने की मांग कर के गुनाह कर लिया है तो उन सभी सूरताओं को खेल से वापस लाने के लिये ये श्री देवचन्द्र जी रुपी झूठा...
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पांचवे पोहोर में
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अक्षरब्रम्ह की पांच वासनाएं महाविष्णु ,सदाशिव ,सनकादिक ऋषि,शुकदेवजी,कबीरजी
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बसरी सूरत(आत्म अक्षर जोश धनी धाम) को ही यहाँ पर महमंद कहा है और मोमिनों को उनके भाई करके कहा गया है जो तब अरब में नहीं उतरे थे रसूल साहब जब इस दुनिया में आए तो उस वक़्त उसके भाई मोमिन इस दुनिया में आए नहीं थे तो उस वक़्त रसूल साहब ने शरियत की राह चलाई और आखिरत के वक़्त में फिर आने का वायदा किया था
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श्री राज जी महाराज तीन बार सिनगार करते हैं एक तीसरी भोम की पड़साल दूसरा नीलो न पीलो मंदिर में तीन बजे और तीसरा वनों में झीलना के बाद और श्री श्यामा जी और रूहें दो बार सिनगार करती हैं एक तीसरी भोम की पड़साल और दूसरा वनों में झीलना के बाद
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