इनों रब्द किया इस्क का, हम जैसा हक का नाहें ।
दई फरामोसी इन वास्ते, देखों कैसा इस्क इनों माहें ।।
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जीव को ही आत्म के नेत्र कहा है जो यहाँ बेशक ईलम की वाणी से अपने को निर्मल करता है जिससे आत्म बल पकड़ कर अपने निजघर को देखती है
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इश्के हिरसी जो आजकल के नौजवान गलियों में करते फिरते है । इश्के नफसी जो लैला मजनूं जैसे जोड़ों ने किया इश्के हकीकी जो मीरा और सूरदास ने कृष्ण से किया इश्के मारफत जो अखण्ड पारब्रह्म के साथ एक आत्म ही कर सकती है
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पूरी मेहर जित हक की, तित और कहा चाहियत । हक मेहर तित होत है, जित असल है निसवत ।। पूरी मेहर ब्रह्मसृष्टि के लिए आई है श्री राजी की मेहर ब्रह्मसृष्टि पर होती है कृपा ईश्वरी सृष्टि पर और दया जीव सृष्टि पर होती है
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रूहों की जैसी साहेबी परमधाम में है, लक्ष्मीजी को भी इसी तरह समझें। इनकी एकदिली में फर्क नहीं है, इसकी जानकारी रूहों को ही है जिनका तन परमधाम में है
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