आज की चौपाई

श्री धनीजी के लागूँ पाए,मेरे पिउजी फेरा सुफल हो जाए।
ज्यों पिउ ओलखाए मेरे पिउजी ,सुनियो हो प्यारे मेरी विनती।।

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Shri Nijanand Samparday

बानी मीठी नरमाई जोत धरे, मेरे जीव के एही जीवन ।। चौपाई के इन चरनों में किसकी वाणी की मिठास की बात कही गई है बताईए सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

श्री श्यामा महारानी के चरणों के चारों आभूषण झांझरी, घूंघरी, कांबी और कड़ला तथा चरणों के पंजे में अनवट और बिछुआ का तेज और सुन्दर सुरीली आवाज यह ही मेरे जीव के जीवन हैं।

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कठिन निपट विकट घाटी प्रेम की, त्रबंक बंको सूरो किनों न अगमाए। धार तरवार पर सचर सिनगार कर, सामी अंग सांगा रोम रोम भराए ।। प्रेम के रास्ते में तीन बंकर यानि रुकावटें कौन सी आती है बताईए सुन्दरसाथ जी

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धनी के प्रेम का रास्ता बड़ा कठिन है। इसमें कई कर्मकाण्ड (शरीयत) उपासनाकाण्ड (तरीकत) और ज्ञानकाण्ड (हकीकत) के तीन टेढ़े रास्ते यानि की तीन बंकर हैं, जिन पर चलने वाले बड़े-बड़े शूरवीर भी इस प्रेम-मार्ग पर नहीं चल पाते। यह रास्ता तलवार की धार पर चलने के समान है। इस रास्ते में सामने से गुण, अंग, इन्द्रियों के भाले छेद रहे हैं, इसलिए हे मेरी आत्मा! तुम धैर्य और साहस का श्रृंगार करके चलो।

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Shri Nijanand Samparday

साथ हतो जे इंद्रावती पासे, वाले पूरी तेनी आस रे। सकल मनोरथ पूरण थया रे, फलिया ते रास प्रकास रे।। ये कहाँ का प्रसंग है और कौन श्री इंद्रावती जी के साथ कहाँ था जिन की आस भी उन्होंने पूरी की थी बताई सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

हवसा में श्री इन्द्रावतीजी के साथ जो दो और साथी थे, (सांवलिया ठाकुर और ऊधो ठाकुर) को भी दर्शन देकर उनकी भी चाहना राजजी ने पूर्ण की। इस प्रकार हमारी सब चाहना पूर्ण हो गई। रास और प्रकाश का फल मिल गया अर्थात् धनी मिल गए।

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यों लिख्या फुरमान में, आखिर बीच हिंदुअन । मुलक होसी नबियन का, धनी दई बड़ाई इन।। कौन सा मुल्क और कौन से नबी बताईए सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

कुरान में यह भी लिखा है कि आखिरत को हिन्दुओं के बीच सब नबी आएंगे। सारे भारतवर्ष में ही ब्रह्मसृष्टियां उतरेंगी। धनी ने ब्रह्मसृष्टियों को बड़ाई दी है।

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साथ हतो जे इंद्रावती पासे, वाले पूरी तेनी आस रे। सकल मनोरथ पूरण थया रे, फलिया ते रास प्रकास रे।। ये कहाँ का प्रसंग है और कौन श्री इंद्रावती जी के साथ कहाँ था जिन की आस भी उन्होंने पूरी की थी बताई सुन्दरसाथ जी

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हवसा में श्री इन्द्रावतीजी के साथ जो दो और साथी थे, (सांवलिया ठाकुर और ऊधो ठाकुर) उनकी भी चाहना राजजी ने पूर्ण की। इस प्रकार हमारी सब चाहना पूर्ण हो गई। रास और प्रकाश का फल मिल गया अर्थात् धनी मिल गए।

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