आज की चौपाई

श्री धनीजी के लागूँ पाए,मेरे पिउजी फेरा सुफल हो जाए।
ज्यों पिउ ओलखाए मेरे पिउजी ,सुनियो हो प्यारे मेरी विनती।।

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सतसरूप ब्रह्म किसको कहा है और ये कहाँ पर है बताईए सुन्दरसाथ जी

by Shri Nijanand Samparday

सतसरूप ब्रह्म श्री अक्षर ब्रह्म के अहं का सरूप है जो योगमाया में रहता है

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फेर आए रसूल स्याम मिल, सोई फेर आये यार। देख निसवत पांचों दुनीमें, क्यों छोड़ें असल अर्स प्यार ।। इस चौ. का बेवरा करें सुन्दरसाथ जी

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अब दूसरी बार हुकम के स्वरूप श्री मुहम्मद साहब जिनमें आत्म अक्षर और जोश धनी धाम दो शक्तियां थी जो ब्रज रास खेल कर अरब में श्री महमंद साहब के अंदर आ गई थी वोह और श्री श्यामाजी दोनों मिलकर श्री प्राणनाथजी हकी सरूप के अन्दर हैं और वही सखियां भी फिर सुन्दरसाथ के रूप में आई हैं। यह श्री प्राणनाथजी के अन्दर पांचों शक्तियों (धनीजी का जोश, श्यामाजी, आत्म-अक्षर, जागृत बुद्धि और हुकम) के दर्शन करती हैं। यह स...

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परमधाम में यह कहाँ का दृश्य है और इसमें से किन्हीं तीन जगह की पहचान कर के बताईए सुन्दरसाथ जी

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यह सुन्दर दृश्य पुखराज पहाड़ का है इसमें पांच पेड़, उत्तर पश्चिम की घाटी , बंगलों की शोभा , सोलह नहरों के गिरने का अनुपम दृश्य, आकाशी मोहोल, अधबीच का कुंड , ढपो चबुतरा . मूल कुंड इत्यादि और भी बहुत सारी बेशुमार शोभा से सुसज्जित है श्री पुखराज पहाड़

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ते माटे हूं कहयूं एम, नहीं तो रामत जे कीधी श्री कृष्ण। ए नामनुं तारतम में केम केहेवाय, साथ संभारी जुओ जीव मांहें।। कृप्या इस चौपाई का बेवरा करते हुए बतायें कि कौन सा नाम तारतम में क्यूं है ऐसा श्री इन्द्रावती जी श्री राज जी से पूछ रही हैं ?

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हे सुन्दरसाथ जी! यदि आप अपने जीव के हृदय में विचार करके देखें, तो इस श्री कृष्ण नाम को तारतम में कैसे कहा जा सकता है?। उपरोक्त चौपाई में इसी सत्य को उद्घाटित किया जा रहा है कि शरीर के नाम श्री कृष्ण को तारतम में कैसे कहा जा सकता है?

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सुक सनकादिक ने नव टली,लखमी नारायण ने फरीवली। विष्णु वैकुंठ लीधां माहें,सागर सिखर न मूक्या क्यांहें।। वाणी की इस चौपाई में किसकी बात हो रही है जिसमें सब शामिल हैं बताईए सुन्दरसाथ जी

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इसमें माया के बारे में बात हो रही है कि इसने शुकदेव मुनि तथा सनकादिक ऋषियों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत कुमार) को भी इसने नहीं छोड़ा। लक्ष्मी और नारायण जो जगत के परमात्मा हैं, को भी इस माया ने अपने फन्दे में फंसा रखा है। बैकुण्ठ में बैठे विष्णु भगवान को भी अपने अन्दर ले लिया है, अर्थात् समुद्र से पहाड़ की चोटी तक (पाताल से बैकुण्ठ व नारायण भगवान सन्पूर्ण क्षर पुरुष) किसी को माया ने नहीं छोड़ा।

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