जब याद तुमें मैं आंऊगा, तबहीं बैठोगे जाग ।
गए आए कहूं नहीं, सब रूहें बैठीं अंग लाग ।।
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श्री कुलजम वाणी आवेश से उतरी जब हवसे में श्री इन्द्रावती जी के दिल में आवेश की बैठक हुई श्री देवचन्द्र जी के अन्दर जोश था वहाँ वाणी नहीं उतरी
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कालमाया में स्वपन की बुद्धि होने के कारण अपने पिया का नाता भूल गए और उनको पर पुरुष कह दिया मगर योगमाया में आते ही जाग्रत बुद्धि मिल जाती है जिस कारण यहाँ को रूहों ने अपना प्राणनाथ माना खाविंद माना
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नलिए में
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हक की मेहर सिर्फ निसवती सुन्दरसाथ ब्रह्मसृष्टि के लिए ही आई है हक मेहर तित होत है जित असल है निसवत श्री राजी महाराज जी की मेहर तो ब्रह्म सृष्टियों के लिए,कृपा ईश्वरी सृष्टि के लिए,दया जीव सृष्टि के लिए आई है।
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